दुर्गा कुंड मंदिर

दुर्गाकुंड, वाराणसी

टेम्पल सर्किट · पढ़ने की गाइड · 8 September 2026

इस मंदिर की यात्रा बनाएँ

कहानी से शुरुआत

लाल मंदिर और आयताकार कुंड को साथ देखिए। दुर्गा का स्वयं प्रकट होना स्थल की पावन कथा है; अठारहवीं सदी में रानी भवानी की सेवा भवन के इतिहास का अध्याय है।

स्थल पुराण

स्थल पुराण में दुर्गा यहाँ स्वयं प्रकट होती हैं; उनकी प्रतिमा किसी शिल्पी ने नहीं बनाई। वे रक्षा करने वाली माता के रूप में पूजित हैं। लाल मंदिर और पास का कुंड दक्षिणी काशी में उनकी उपस्थिति को विशिष्ट स्थान देते हैं।

निर्माता, शिल्प और संरक्षण

सरकारी पर्यटन विवरण के अनुसार अठारहवीं सदी में बंगाल की रानी भवानी ने यह मंदिर बनवाया। नागर शैली के एक-दूसरे से जुड़े शिखर कुंभकोणम के गोपुरम से अलग वास्तु-रूप दिखाते हैं।

अपनी यात्रा की तैयारी

पूजा और नीचे दी गई जगहों को देखने का समय रखें। प्रवेश और तस्वीरों के लिए लगे निर्देश मानें।

ठहरकर देखने की जगहें

अनुमत आँगन से

लाल शिखरों की रूपरेखा देखें: ऊँचे केंद्रीय शिखर के चारों ओर छोटी चोटियाँ हैं। रानी भवानी का अठारहवीं सदी का यह नागर मंदिर कुंभकोणम के ऊँचे प्रवेश-गोपुरम से तुलना का स्पष्ट उदाहरण है।

सुरक्षित सार्वजनिक किनारा

सुरक्षित किनारे से देखें कि आयताकार कुंड लाल मंदिर के सामने खुली जगह कैसे बनाता है। इसी जलाशय से दुर्गा कुंड नाम मिला है; स्थान को मंदिर और सरोवर दोनों के साथ समझें।

स्रोत

Incredible India · Background and references