ऐरावतेश्वर मंदिर

दारासुरम

सहेजी हुई प्रति · 7 सितंबर 2026 · 8 September 2026

इस मंदिर की यात्रा बनाएँ

ऐरावतेश्वर मंदिरPhoto: Naveen da / Wikimedia Commons · CC BY-SA 4.0

एक मिनट में दारासुरम

मंदिर के शिखर की ओर देखने से पहले, पत्थर के पहिए खोजिए। प्रवेश मंडप ऐसा लगता है जैसे घोड़े किसी रथ को खींच रहे हों। अब मंदिर के आधार पर बने छोटे शिल्पों के पास आइए। यहाँ तिरसठ नायनमार संतों के जीवन-प्रसंग उकेरे गए हैं। कोई भाव, कोई मुद्रा, कोई अर्पण—हर बारीकी ठहरने को कहती है। यह ऐरावतेश्वर का मंदिर है, जिसके नाम में इंद्र के श्वेत हाथी ऐरावत की स्मृति बसती है। बारहवीं सदी में चोल राजा राजराज द्वितीय ने इसे बनवाया था। पीढ़ियों ने यहाँ की पूजा-परंपरा को सँजोया है। आज रथ को देखिए, अनुमत जगह से संगीतमय सीढ़ियों पर ध्यान दीजिए और एक छोटा शिल्प चुनिए जो याद रह जाए। सब कुछ जल्दी-जल्दी देख लेना ज़रूरी नहीं। एक कहानी अपने साथ ले जाइए।

स्थल पुराण

शिव के इस धाम के नाम में इंद्र के श्वेत हाथी ऐरावत की स्मृति है। स्थल पुराण में यम की कथा भी आती है। एक ऋषि के श्राप से उनके पूरे शरीर में असहनीय जलन होने लगी। यम यहाँ आए, शिव की आराधना की और पवित्र सरोवर में स्नान किया। शिव की कृपा से उन्हें श्राप से मुक्ति मिली। इस तीर्थजल को यमतीर्थम कहा जाता है। मंदिर और उसका सरोवर मिलकर प्रभु की कृपा पाने वालों का यह पावन इतिहास सँजोते हैं।

निर्माता, शिल्प और संरक्षण

बारहवीं सदी में राजराज द्वितीय ने इस मंदिर का निर्माण कराया। राजगंभीरन मंडप को पहियों और घोड़ों वाले पत्थर के रथ का रूप दिया गया है। मंदिर के आधार पर तिरसठ नायनमार संतों के जीवन-प्रसंग हैं और मंडप के स्तंभों पर नृत्य की अनेक मुद्राएँ। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इन बारीकियों का विवरण दर्ज किया है। दारासुरम यूनेस्को के महान जीवंत चोल मंदिरों में शामिल है। पत्थर की कला के साथ आज भी जारी पूजा इसकी पहचान का हिस्सा है।

दारासुरम में आपकी यात्रा

प्रकाशित समय: सुबह 8–दोपहर 12; शाम 4–8

पूजा और ठहरकर देखने सहित 60–90 मिनट रखें। पत्थर का फर्श और सीढ़ियाँ हैं; सीढ़ियों में कठिनाई हो तो कर्मचारी से आसान रास्ता पूछें।

इन्क्रेडिबल इंडिया की जानकारी, 8 सितंबर 2026 को जाँची गई। निकलने से पहले गर्भगृह के दर्शन का समय पूछें; प्रकाशित आगंतुक समय दर्शन की गारंटी नहीं है।

अपनी गति से छह खोजें

राजगंभीरन प्रवेश मंडप · लगभग 10 मिनट

अनुमत हिस्से में मंडप के पास खड़े होकर पहिया, उसकी तीलियाँ और घोड़ा देखिए। दोस्त के साथ चुनिए कि कौन-सी बारीकी रथ के चलने का आभास देती है। शिल्पों पर न चढ़ें।

बलिपीठ की ओर जाती सीढ़ियाँ · लगभग 5 मिनट

इन सात सीढ़ियों का संबंध संगीत के सात स्वरों से है। घेरे के बाहर से देखें और कर्मचारी से इन्हें पहचानने में मदद लें। ध्वनि सुनने के लिए सीढ़ियों को न बजाएँ।

मंदिर के आधार पर छोटे कथात्मक शिल्प · लगभग 15 मिनट

एक दृश्य चुनकर चेहरे, मुद्रा और अर्पण पर ध्यान दें। उपलब्ध नाम-पट्ट पढ़ें या मार्गदर्शक से पूछें कि यह किस संत का प्रसंग है। जो बारीकी सबसे पहले दिखी, उसे दोस्त के साथ साझा करें।

मुख मंडप के स्तंभ · 5–10 मिनट

एक नृत्य-मुद्रा चुनिए। पैरों से हाथों तक उसकी गति को देखिए और दोस्त से अपनी खोज साझा कीजिए। पूजा के लिए आने वालों का रास्ता खुला रखें।

मुख्य मंदिर के उत्तर में अलग मंदिर · 10 मिनट

अपने घेरे में स्थित अम्मन मंदिर के लिए समय रखें। कर्मचारी से खुला रास्ता और दर्शन की व्यवस्था पूछें। देवी के दर्शन के साथ अपनी यात्रा को पूरा कीजिए।

प्रांगण का अनुमत हिस्सा · 5 मिनट

एक बार फिर पूरे मंदिर को देखिए। यहाँ पूजा जारी है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण स्मारक की देखभाल करता है। शिल्पों को छुए बिना निहारें। हर दोस्त एक बारीकी चुने जिसे अगला यात्री ज़रूर देखे।

स्रोत

Incredible India · sthala puranam and visiting hours · ASI · architecture and Nayanmar panels · Tamil Nadu Tourism · architecture & musical steps · UNESCO · Chola temples